संजय डुबरी; टायगर, भालू और भावकी बझार ..!
संजय डुबरी; टायगर, भालू और भावकी बझार ..!
“जंगल एक खुली किताब है, इसे कहीं से भी पढ़िए, इसकी ना कोई शुरुआत है, ना कोई अंत। आप जीवन के किसी भी मोड़ पर इसका कोई भी पन्ना खोलिए, अगर आप में कुछ जानने की चाहत है, तो आप इसे चाहे कितनी भी देर, और किसी भी इरादे से क्यों ना पढ़ें, इसमें आपकी रुची हमेंशा बनी रहेगी, क्यों कि प्रकृती अनंत है।.”― जिम कॉर्बेट
“में जब भी जंगल से लौटता हूँ तो खुद को ज्यादा खुश इन्सान पाता हूँ” … मैं
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जंगल का राजा!!
संजय दुबरी (मप्र) राष्ट्रीय उद्यान के विस्तीर्ण जंगलो में बाघ खोजना घास में सुई खोजने की तरह है। लेकिन आसमान में सूरज कहर ढ़ा रहा है, तो यह जरूर गरमी से बचके के लिए पानी की तलाश में होगा। तालाब के आस-पास दूसरे किसी जानवर का ना होना, संकेत है कि वह आस—पास ही है। अब संयम और प्रतीक्षा का खेल शुरु हो जाता है, वह छांव में आराम से बैठा हुआ है और आप चिलचिलाती धूप में उसकी राह देख रहे हो, पारा 44 डिग्री तक चला गया है। और आज आपका नसीब ज़ोरों पर है, दूसरी ओर से जंगल में गश्त लगाने वाले हाथी का आगमन होता है। बाघ को यह बिल्कुल पसंद नहीं की उसे कोई परेशान करे, लेकिन हाथी अपना काम कर रहा है, और जंगल के राजा आराम फरमा रहें हैं इस बात से अनजान आगे बढ़ जाता है। जंगल के राजा इस बात से परेशान हैं की उन्हे अपना विश्राम का स्थान छोड़ खुले में आना पड़ा। उसकी नजर आपकी कॅमेरा लेन्स को चिरती हुई आप तक पहुंचती है। आप उन चमकती, नारंगी, खूंखार आँखों की दहकती गर्मी महसूस कर सकते हो। और उस समय आप भगवान का शुक्रिया अदा करते हो कि वह आपसे सौ फीट दूरी पर है। साथ में उसकी पोजेस देखकर आप खुश भी होते हो...राजा ऐसाही होता है... त्रिशूल, संजय दुबरी राष्ट्रीय उद्यान. गर्मी का मोसम 26.
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संजय दुबरी और बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान से लौटकर मैंने इन्स्टाग्राम पर यह सबसे पहला पोस्ट किया। पिछले साल गर्मीयों में ही में वहाँ गया था, और दुबारा गर्मीयों में ही खुद को वहाँ पा कर मैं काफी चकित था। यह स्थान पुणे से लगभग 1500 किलोमीटर दूर है। कुछ काम से मैं ड्राइव कर पुणे से पेंच गया था तो वहीं से आगे दुबरी चला गया। मध्य भारत में गर्मीयों का मौसम (या किसी भी मौसम में) होते हुए भी रोड ट्रीप करनें से मुझे थकान नहीं होती। आप जब नागपूर से बाहर निकलते हो, तब चारों ओर वन्यजीवन दिखाई देता है, देश इस हिस्से को प्रकृती का वरदान प्राप्त है। लेकिन यहाँ के लोगों लिए यही बात कहना मुश्किल है, क्यों कि चरम मौसमी परिस्थितीयों के कारण उनका जीवन कठिनाईयों से भरा हुआ है, आमदनी कम है, ऐसी स्थिती में आप अपनी जरूरतों पर लगाम कसते हो। जैसे की मैंने अपने पहले आर्टिकल में बताया था की संजय दुबरी मध्य प्रदेश के एक कोने मे स्थित है, वृद्धि, विकास, समृद्धि जैसे शब्दों का यहाँ से कोई सरोकार नहीं है, और केंद्र एवं राज्य सरकार की कोशिशों का उचित सन्मान करते हुए मैं यह बात कर रहा हूँ। इस इलाके का विकसित न होना वन्य जीवन के लिए एक वरदान है लेकिन यहाँ वन संरक्षण एक बड़ी चुनौती है। इस लेख के माध्यम से यह बात सब के सामने रखना मेरा उद्देश है। वन्यजीवन की बात करें, तो दुबरी में काफी कुछ बदल चुका है, खासकर बाघ दिखाई देने के संदर्भ में। वन विभाग, सच्चे वन्यप्रेमी और वन संरक्षक बाघ दिखाई देना ही सब कुछ है ऐसा नहीं मानते, लेकिन वन्यजीवन पर्यटन की बात करें तो यह सबसे महत्वपूर्ण बात बन जाती है। बाघों के दर्शन पर पाबंदी ना हो यह बात हम जब तक नहीं स्वीकारते, तब तक हम वन्य संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन नही रख पाएंगे। इसी का दूसरा नाम है निरंतरता, इस क्षेत्र से जुड़े हुए सारे पक्षों को यह समझना होगा। इस बार में अपने कुछ वन्यप्रेमी साथियों के साथ था, मैंने उन्हे समझा दिया था की बाघ दिखनें की ज्यादा उम्मीद ना रखें, जंगल का आनंद लें। लेकिन बात ऐसी थी कि आपका दिमाग तो यह बात समझता है, फिर भी दिल उसी पिले-काले लकिरों को देखनें के लिए तरसता है, वन्यजीवन का यही सच है। हमें दुबरी के बाद बांधवगढ़ के लिए निकलना था, ताकी हमें बाघ देखने का और मौका मिले, यह बात मैंने अपनें दोस्तों से साझा की। दुबरी का जंगल विस्तीर्ण है, और ताड़ोबा या बांधवगढ़ की तरह यहां घास के मैदान या खुली जगाएं नहीं हैं, जहाँ आप को बाघ स्पष्टता से दिखाई दे। यह देन है बनास नदी की जो इस जंगल से होकर गुज़रती है, और गर्मीयों में भी वन्यजीवन के लिए पर्याप्त पानी देती है। इस उद्यान में अन्य लोकप्रिय उद्यानों की तरह पर्यटकों की भीड़ नही उमड़ती। इसी कारण यहाँ के बाघ जिप्सीयों के आवाजाही से ज्यादा परिचित नहीं हैं। मैंने अपने पिछले सफारी में यह अनुभव किया था। लोकप्रिय मौसी (बाघिन जिसनें दुबरी का नाम देश-दुनिया में पहुंचाया) को छोड़कर अन्य बाघ थोडे शर्मीले हैं, यह मैंने अपने वन्यप्रेमी दोस्तों को पहले से ही बताकर रखा था। लेकिन यही तो जंगल या वन्यजीवन की विशेषता है, या वरदान, आप जो भी कहें, हमनें बाघ शायद नजर ना आए इसके लिये मन को समझा लिया था, लेकिन मैंने दोस्तों को जो बोला था, दुबरी में ठीक उसके उलटा हुआ। हमें केवल तीन सफारी में लगभग छह बाघ दिखे, ये तो सोने पे सुहागा था, क्यों कि हम केवल जंगल देखने के उद्देश से गए थे, जिसका हमनें भरपूर आनंद लिया। मध्य भारत में यह गर्मीयों का मौसम था, और संजय दुबरी उद्यान उत्तर भारत की ओर (उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा हुआ, यहाँ से अयोध्या बस 80 किलोमीटर दूर है) होने के कारण वहाँ भीषण गर्मी थी और बाघ पानी के तरफ जा रहें थे। उद्यान के भीतर पर्याप्त पानी होने के बावजूद, बाघ की कुछ आदतें होती है, वो केवल चुनिंदा जलाशयों पर जाना पसंद करता है, और वहाँ केवल पानी पिने और आराम करने के लिए जाता है। मुझे यह देखकर बेहद आश्चर्य हुआ की त्रिशूल नाम का युवा बाघ लगभग पाच-छह जिप्सीयों के सामने से गुजरा। इन जिप्सियों में करीब बीस के उपर लोग थे, जिसकी तुलना ताड़ोबा में दिखाई देने वाली भीड़ से हो सकती है। लेकिन वह उसे निहारती नजरों से बिल्कुल परेशान नहीं था, यह कुछ नया था और इसे देखना एक सुखद अनुभव था। यहाँ के बाघ अब अपने आस-पास इन्सानों को स्वीकार रहें है, इसी बात को यह दर्शाता है। यह एक बहुत सकारात्मक बात है जब पर्यटन का हेतू वन संरक्षण हो। इस लेख के माध्यम से में यही बताना चाहता हूँ। यहाँ आए हुए ज्यादा तर पर्यटक आम फैमिली थे (यानी व्यावसायिक या बाघ को तलाशते वन्यप्रेमी नहीं थे)। इसी वर्ग ने जंगल में बाघ देखना जरूरी है, क्यों की तब ही वे वन्यजीवन से प्यार करने लगेंगे, और लोगों की तारीफ से ही (समाज माध्यम के जरिए) कोई जगह पर्यटन के लिए मशहूर हो जाती है। दुबरी में आए हुए पर्यटकों के चेहरे देख अब यह स्थान वन्यजीवन के लिए काफी मशहूर होने लगा है, यह मैं महसूस कर पा रहा था।
तीनों सफारी में हमने दुबरी का विस्तीर्ण जंगल देखा, यहाँ की सुंदरता को नजरों में भऱ लिया, बनास नदी ने जंगल को दिया हुआ आशीर्वाद देखा और वन्यजीवन के कुछ अद्भूत पलों को समेट लिया। मेरे पिछले दौरे में बने दोस्त श्री. बाबुनंदन जो डेप्युटी रेंजर है, एक सफारी में हमारें साथ थे। बातचीत के दौरान उन्होंने अपनें अनुभव साझा किए, और जंगल में लगी आग में फ़से बाघ को कैसे छुडाया इसका रोचक किस्सा भी बताया। जिन्होनें कभी जंगल की आग देखी नहीं है उन्हे बताता हूँ, यह देखते ही देखते कई हेक्टर जंगल में फैल जाती है। ये आग अपनें रास्ते में आने वाले हर एक चीज को अपनें चपेट में ले लेती है। इसका स्वरूप इसना रौद्र होता है कि उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है, आप बस इसे केवल अनुभव कर सकते हो, अगर इससे नसीब से बच गए तो। ऐसी आग से बचने के लिए ज्यादातर लोग और जानवर सबसे पहले उससे दूर भागेंगे, लेकिन इस छोटे कदके इन्सान ने हाथ में आग बुझाने के कोई साधन ना होता हुए, अपनी ज़ान ज़ोखीम में ड़ाल कर बाघ की जान बचाई। इसे कहते है समर्पण और वह केवल पैसे से नही आता तो दिल से आता है, बाबुनंदन और उनके वन मजदूरों को उनके काम के लिए सलाम। उनके साथ हमनें एक युवा और शर्मीले बाघ को जंगली सुअरों की झुंड का पीछा करते हुए देखा, जो बाघ से तेज दौड़ रहें थे। कुछ ही मिनटों में बाघ ने उनका पीछा छोड़ दिया और नज़दिकी पानी की झील में बैठकर आराम करने लगा। उसने आराम करने के लिए जो जगह चुनी वह छुपने के लिए बडी बेहतरीन थी, केवल कोई ज़ानकार नजर ही उसे ढूँढ सकती थी। हमेशा की तरह इन तसविरों को कैमेरे कैद करने के लिए केवल पेडो के बीचमेसे एक छोटीसी जगह थी। बाघ को हमारे आस-पास होने की खबर थी, और वह उसी दिशा में देख रहा था। उसके चेहरे पर एक मुस्कानसी थी, मानो जैसे घने पेड़-पौधों के बीच से उसकी तसवीरें लेने की कोशिश पर वह हँस रहा हो। कुछ समय आराम फरमाने के बाद वह उठा और शिकार करने और अपनी सीमा अंकित करने के काम पर निकल गया, तब तक हम चिलचिलती धूप में उस युवा बाघ का इंतजार कर रहे थे। वह बहुत शर्मीला बाघ था, जिसे ज्यादा वेइकल आस-पास देखने की आदत नहीं थी। दो जिप्सी होने के कारण हम उसका पीछा कर पाए और अंत में जब वह हमारे सामने सड़क पार कर रहा था, हम उसे देख पाए। वह जंगल के भीतर चला गया जहाँ किसी गाडी का पहुँच पाना मुमकिन नहीं था। इस उमदा और बड़े से बाघ को देखकर मुझे एक बात का एहसास हुआ, उसे हमारे आस-पास होने की, हम उसकी ओर टकटकी लगा कर बैठे है इसकी खबर थी, लेकिन एक बार भी वह हमसे रूबरू नहीं हुआ, जैसे काफी बाघ होते है। वो हमेशा हमें अपनी एक तरफ रख रहा था, जो काफी रोचक बरताव था ऐसे मुझे लगा। लेकिन यहाँ के गाइड और अन्य जिप्सी में जो पर्यटक थे उनका कहना था की पहली बार यह बाघ इतनी देर तक दिखाई दिया है, बाकी समय जिप्सी की भनक लगते ही बाघ जंगल के भीतर गायब हो जाते है। यह दर्शाता है की धीरे-धीरे उसे लोगों के नजरों की आदत हो रही है, यह वन्य पर्यटन के लिए भी यह अच्छी बात है, और इसे ही सह-अस्तित्व कहते है।
और भी कुछ अद्भुत अनुभव हमारी राह देख रहे थे। लगभग दो घंटों तक इस बाघ का पीछा करने के बाद हम धीरे-धीरे मुख्य जलाशय की ओर जा रहें थे, जहाँ हमनें पहले बाघ और बाघिन देखी थी। अचानक से रास्ते के किनारे एक कालासा ढेर दिखाई दिया, वह एक बड़ासा भालू था। मैने धीरे से ड्राइवर का कंधा थपथपाकर उसे हम जहाँ है वहीं रुकने और इंजन बंद करने का इशारा किया, क्यों कि पूरे जंगल में भालू एक ऐसा जानवर है, जिसका आप अंदाजा नहीं लगा सकते हो। कोई उन्हे देख नही रहा, या परेशान नहीं कर रहा यह भरोसा दिला कर ही आप उनकी तसविरें खींच सकते हो, और वो अपनी मर्जी के मालिक होते हैं। वह एक बड़ा सा नर था और काफी देर तक वह पेडों के पीछे छुपकर हमारी आवाजाही का अंदाजा लगा रहा छा। जैसे ही उसे यकीन हुआ कि हम एक ही जगह रुके हुए है, वह अंदर चला गया। एक पल के लिए हमें लगा की हमने उसे नजदिक से देखने का मौका गंवा दिया। मै जानता था कि भालू रास्ता पार करना चाह रहा था, केवल वह ये अपने तरीके से करता। इसीलिए मैंने ड्राइवर से हम जहाँ है वही पर इंतजार करने के लिए कहा। जैसे ही वह भालू हमारे पीछे चला गया, बीच में एक छोटीसी पहाडी थी। मैंने ड्राइवर से जिप्सी थोडी पीछे लेने के लिए कहा, ताकि हम भी आगे निकल चुके है यह भालू जान ना सके। कुछ ही मिनटों में वह भालू रास्ते पर आया और कुछ पल अपने पिछले पैरों पर खड़ा हो गया, लगभग दो दशकों से यह दृश्य देखनें की मेरी चाहत थी, और आखिरकार संजय दुबरी में वह ख्वाइश पूरी हुई। मैं उस पल की तस्वीरें खींच पाया या नहीं मैं नहीं जानता था लेकिन मैं वह देख पाया ये मेरे लिए ज्यादा जरूरी था, जंगल ऐसा ही होता है, इच्छापूर्ति करनें वाला।
कुछ समय बाद, हमें बेहद खुबसूरत बाघिन टी17 और उसकी किशोर शावक दिखाई दिये। वह शावक अब लगभग बड़ी हो चुकी थी, लेकिन फिर भी माँ के नजदीक रहना चाहती थी, जो माँ को कतई मंजूर नही था। उस इलाके के में और एक बाघ था जो इस शावक का पिता नहीं था, इसीलिए उस शावक से दूर जाकर माँ ने उसे सुरक्षित रखा। क्या वह शावक माँ ने उसके लिए ज्यो त्याग किया है, वो कभी समझ पाएगी ऐसा मैं सोचने लगा। काफी देर तक वह बेचारी शावक घास में बैठकर अपनी माँ की ओर आँखे लगाकर बैठी रही, जो लौटकर नहीं आई। शायद कुछ दिनों बाद जब वो खुद माँ बन जाएगी तब एक बाघिन का माँ होना क्या होता है वो समझ पाएगी! जब हम लौटकर मप्र पर्यटन विभाग के रिसॉर्ट पर गए, जो बनास नदी के किनारे स्थित बेहद सुंदर जगह है, एक युवा आरएफओ दोस्त अर्पित मैराल हमसे मिलने आए और अपने अनुभव हमसे साझा किए। उन्होंने जंगल के किनारे एक किसान के कोठी में घुसे एक तेंदुए को छुड़ाने का किस्सा भी सुनाया। जंगल में ऐसी बातें काफी आम होती है, लेकिन सोचिए उनसे कितना तनाव पैदा होता। अगर बेड़रूम में एक मधुमख्खी भी घुस जाए जो उछलकूद मचाने वाले लोग मैंने देखे हैं, मान लो जैसे उन्हें सेकड़ो मधुमख्खीयों ने दंश किया हो, यहाँ तो एक तेंदुआ घर में घुस आया था। वन्यजीवन कैसा होता है यह अनुभव करने के लिए हम में से ज्यादा से ज्यादा लोगों ने जंगल की सैर करनी चाहिए, तभी उसके संरक्षण का कर्तव्य हम निभा पाएंगे, है ना?
दुबरी से निकलते हुए, हमें साप्ताहिक बाज़ार दिखा, जिसे स्थानिक भाषा में “भावकी” कहते है। रंग-बिरंगे कपड़े पहने गाँववाले और आदिवासी वहाँ के ठेलों पर मोल भाव करते नजर आते है, ऐसे बाज़ारों का माहौल हमेशा उत्साह भरा होता है। मेरा मानना है कि हमें इनका ज़ोर-शोर से प्रचार करना चाहिए, क्यों कि ऐसे सड़क-किनारे लगने वाले सस्ते-बाजार यूरोप में काफी प्रचलित है, हमारे शहरों में भी यह संकल्पना अब लोकप्रिय हो रही है। तो क्यों ना ऐसे बाज़ारों को वन्य पर्यटन में शामिल किया जाए, ताकि लोक स्थानिकों द्वारा लगाए इस सस्ते बाज़ार को अनुभव कर सके। ऐसी जगाओं पर ही आप लोगों की संस्कृति को सचमुच अनुभव कर सकते हो, जिनका जीवन जंगल से जुड़ा हुआ है। मुझे आशा है कि मेरा लेख ऐसे किसी व्यक्ति तक पहुँचे, जो इस दिशा में उचित कदम उठाएं। संजय दुबरी उद्यान के बाहर लगे इस बाज़ार से हम गुजर रहें थे, तब शाम काफी देर हो चुकी थी। लोगों की आवाजें, संगीत और कहीं दूर से हिरण की बाघ के लिये चेतावनी (अलार्म कॉल) सुनाई दे रही थी, जो इन सारे आवाजों में घुलमिल गई थी, यही मानव और जंगल का सह-अस्तित्व है; यह सोचते हुए मन ही मन मुस्कुराकर, दुबारा लौटने का वाद करते हुए मैंने संजय दुबरी उद्यान को अलविदा कहा।
दुबरी से हम बांधवगढ़ चले गए। पहले मैंने सोचा उसके बारे में भी इसी लेख में लिखूं, लेकिन मुझे एहसास हुआ कि वह पहलेसे ही काफी लंबा है। बांधवगढ़ से लौटने के बाद पिछले हफ्ते वहाँ कुछ घटनाएं घटी, जिनके बारे में भी मैं लिखना चाहता था। इसीलिए अगले लेख का इंतजार कीजिए, lol!
संजय दुबरी जंगलके कुछ यादगार पल आप नीचे दिए गये लिंक पर देख सकते हैं …
https://www.flickr.com/photos/coexistance_is_the_key/albums/72177720333421448/







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