बाघो के साथवाली जिंदगी! 🐾👣































बाघो के साथवाली जिंदगी!
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“जख्मी या नरभक्षी बाघ  को अलग कर दिया जाए, तो आमतौर पर बाघ एक शांतिप्रिय जानवर है। बस अगर कोई उसके बच्चों के या उसके शिकार के बेहद नज़दीक जाए तो ही वह गुर्राकर अपनी आपत्ति दर्शाता है। अगर यह भी असरदार साबित ना हो तो थोडा आक्रामक रूप लेता है, और दहाड़ता है। इन इशारों को नजरअंदाज कर के बाघ के क्षेत्र में घुसपैठ करनेवाला किसी भी प्रकार की क्षति के लिए खुद जिम्मेदार होता है।.”

“प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए मदत करना यह बाघ का मुख्य रूप से काम है, कभी कभी जब बेहद जरूरी हो, या जब इन्सान बाघ का प्राकृतिक खाना उससे बड़ी ही बेरहमी से छीन ले तब ही वह इन्सान की जान लेता है, जिन पशुंओ की शिकार करने का उस पर आरोप लगता है, उसमें से बस दो प्रतिशत शिकार वह करता है, इसीलिए ऐसी कुछ चुनिंदा घटनाओं के वजह से इस पूरी प्रजाती को हिंस्र और खून की प्यासी ठहराना उचित नहीं होगा।”
― जिम कॉर्बेट.

बाघ को जंटलमन कहना यह बात शायद बहुत लोगों को हजम नहीं होगी, लेकिन यह शब्द किसी शौकिया व्यक्ती या वॉट्सएप पर ग्यान बाटने वालों के (व्यंग्यात्मक) नहीं है, पर एक ऐसे व्यक्ती (जिम कॉर्बेट) के है जिन्होंने अपने जीवन का ज्यादा समय इन्सानों के साथ नही, बल्कि बाघो के साथ बिताया है, और किसी भी आधुनिक सुरक्षा साधनों के बिना जिंदा रहें हैं। वह बंदूक अपने पास रखा करते थे, लेकिन उन्होनें कभी उसका किसी भी वन्य प्राणी पर गलत इस्तेमाल नहीं किया, इसीलिए जब बाघो की बात होती है तब कॉर्बेट को याद करना लाजमी है। आजकल बाघ दुबारा खबरों में छाए हुए है, लेकिन हमेशा की तरह गलत कारणों से। मध्य भारत में गर्मियों के मौसम में चिलचिलाती धूप होती है, धडल्ले से काटे जाने वाले पेड़ और वन्यजीवन पर अतिक्रमण यही इसके मुख्य कारण है, और इसकी कीमत बाघ (यानी वन्यजीवन) और जंगलो में रहने वाले इन्सानों को चुकानी पड़ रही है। यह आर्टिकल लिखने का कारण (बाघ है, लेकिन यह ताडोबा के बारे में नहीं है।) हाल ही  मे एक न्यूजपेपर में छपी खबर था, जो विशेष रूप से रणथंबोर टायगर पार्क के एक युवा आरएफओ (रेंज फॉरेस्ट अफसर) के बारे में, ताडोबा के आसपास और असम में भी बाघोद्वारा मारे जाने वाले इन्सानों के बारे में थी। इस में कोई दो राय नहीं है, कि जब बात बाघो की हो तो ताडोबा का जिक्र होना लाज़मी है, लेकिन इस लेख मैं मुख्यतः युवा रेंज अफसर के बारे में बात करुंगा जिसने रणथंबोर में अपनी जान गंवाई, और कैसे हम इन्सानों की अनमोल जान और बाघ दोनों को बचा सकते है। ताडोबा में एक हफ्ते के अवधी में लगभग ८ लोगों बाघो के शिकार बनें। इन घटनाओं को लेकर वहाँ इतना आक्रोश था कि, गाँववालों नें जंगल के कुछ हिस्से को जलाने की कोशिश की, जहाँपर ज्यादातर यह घटनाए  हुई थी। आसामवाले घटना में हजारो गाँववालों ने एक बाघ को मार डाला (आशा करता हूँ वह सही बाघ था, मेरे कहने का मतलब है किसी भी बाघ को मारना गलत ही है, लेकिन फिर भी), जो कथित तौर पर एक गाँववाले की मौत का जिम्मेदार था। इतन ही नहीं गाँववाले, उस बाघ के नाखून और दाँत उखाड़कर ले गए!

इन सारी घटनाओं से आपको क्या पता चलता है (कई लोग सवाल पूछेंगे, ऐसी घटनों से हमें क्या लेना देना), और मैं यह सब एक आम तर्कसंगत (जोक) सोच रखने वाले इन्सान के तौर पर पूछ रहाँ हूँ, किसी वन्यजीव विशेषज्ञ की तौर पर नहीं। इसका जवाब आसान है, बाघो की बढ़ती संख्या निश्चित ही अच्छी बात है, लेकिन हम बाघो के साथ जीने के लिए खुद को ढ़ाल नहीं पा रहें। परिणास्वरूप, इन्सान और बाघोके मृत्यू की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, क्यों की बाघ खुद में बदलाव लाए या कुछ प्रशिक्षण ले और इन्सानों के साथ समंजस बनाकर जिए ऐसी अपेक्षा हम नहीं कर सकते। सच तो ये है, बाघ इन्सानों से कई बेहतर तरीके से जिने की  कोशिश कर रहें है लेकिन उनकी अपनी मर्यादाएं हैं। सबसे पहले तो, बाघ इन्सान जितनाही (या कहिए थोड़ा ज्यादा ही) बुद्धिमान प्राणी है, और इसीलिए वह जितना हो सके उतना इन्सानों को टालने की कोशिश करता है; जैसे हम भी खुद से ताकदवर शत्रू से संघर्ष टालते है, या जब उधारी चुकाने के लिए पैसे नहीं होते तो कर्जा देनेवाले को टालते हैं (बिल्डरों से पूछिये)! मैंने कईबार जंगलों में देखा है की, बाघ को जब इन्सान (विशेषरूप से जब वह पैदल हो) के आसपास होने की भनक लगती है तब वह घने जंगलों में जाकर छुपता है, खास कर बफऱ क्षेत्र में तो यह आम बात है। जब उसे लगता है की इन्सान चलें गए हैं, तब ही वह बाहर निकलता है। बाघ जब जंगलों के रास्तों पर चलता है क्यु की वह सुखे पत्ते या घास पर चलना कम पसंद करता है, और अगर दूर से भी रास्ते पर इन्सान दिखाई दे या उसकी आहट सुनाई पड़े (बाघ इस में माहिर होतें हैं) तो वह शांती से रास्ते से सटे जंगल में निकल जाता है, और आपको धूल में बस उसके पंजों के ताजे निशान दिखाई देते हैं। लेकिन इन्सानों का बर्ताव ठीक इसते विपरित होता है, वे बाघ का रास्ता रोखने की कोशिश करतें है, चिल्लाते हैं, या फिर ऐसी हरकतें करतें हैं, जिससे वह विचलित हो जाए, या फिर डर जाए, और उसी घबराहट में वह उन इन्सानों पर हमला करता है। बाघ आमतौर पर दिन का समय टालतें हैं, क्यों कि उस समय ज्यादा संख्या में लोग बाहर निकलते हैं, लेकिन इन्सान इतनें सरल नियमों का पालन नहीं करते। वे दिन हो या रात बाघ के क्षेत्र में भटकते रहते है, जो उनका शिकार का समय होता है, और गलती से बाघ के शिकार बन जातें हैं। अगर हम उपर दी गई तीनों घटनाओं को देखे तो पता चलता है कि इन्सानों ने बिना किसी सुरक्षा के, सही जानकारी के बिना बाघ के क्षेत्र में कदम रखा, और इसी वजह से बाघ के शिकार बन गए!

फिर भी, कुछ जानें गंवाई गई हैं और किसीको इसकी कीमत चुकानी होगी, क्यों की किसी ने इसकी कीमत चुकाई है। जाहीर सी बात हैं यह कीमत चुकाने वाला बाघ ही होगा, यहीं बात सोचने के लिए यह लेख लिखा गया है। 
रणथंबोर आरएफओ के मौत की घटना की बात करे, तो यह ज्यादा गंभीर है। गाँववालों को ज्यादा जानकारी नहीं होती, वे जंगलों में पैदा होने, और बाघो के आसपास ही पले-बढ़े होने के कारण उनमें अतिआत्मविश्वास होता है, या कई बार उनकी नीजि जरूरतें उनके ड़र पर हावी हो जाती है, और वे गलत समय पर गलत तरीके से बाघ के संपर्क में आते हैं। लेकिन, एक प्रशिक्षित आरएफओ से यह गलती होना, और उसने अपनी जान गँवाना, इस बात को दर्शाता है कि हम अपने वन कर्मचारीयों को (यह सारे राज्यों को लागू होता है) प्रशिक्षण देने में कहीं बड़ी चूक कर रहे हैं, क्यों कि जब बाघ या कोई जंगली जानवर आसपास हो तो किस तरह का बर्ताव हो यह उन्हे पता होना चाहिए। आरएफओ यह वन विभाग का एक वरिष्ठ अधिकारी होता है जो निचले तबके के कर्मचारी और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी भी होता है। और ऐसी घटनाओं की वजह से जहाँ बाघ, चीता और भालू खुले तौर पर घूमते है, वही बहुत कम सुरक्षा संसाधनों के साथ काम करने वाले निचले तबके के कर्मचारीयों में गलत संदेशा जा सकता है। रणथंबोर की घटना के बारे में कई सारी बातें हो रही है, इनमें से एक है वन विभाग एक चोटिल शेरनी को गाय/भैंस के बछड़े खिला रहा था, क्यों कि उस स्थिती में शिकार करना उसके लिए संभव नही था और उसके बछड़े छोटे थे। उस क्षेत्र के बाकी बाघो को जब मांस खिलाने वाली बात पता चली तो वह भी शेरनी के आसपास इंतजार कर रहें थे। जब यह मांस लेकर जाते हुए ही एक बाघ ने आरएफओ पर हमला किया जो उस समय निहत्था घूम रहा था। इस बात में सच्चाई है या नहीं मैं नहीं जानता लेकिन यह संभव है, और ठीक इस घटना से पहले सोशल मीडिया पर कई ऐसे छायाचित्र थे जिनमें बाघ उसी जगह पर जिप्सीयों के बिच से आराम से घूम रहे थे, यानी उनका आसपास इन्सान होने का ड़र खत्म हो गया है, जो एक गंभीर बात है, जिसे हममें से ज्यादातर लोगो नें नजरअंदाज कर दिया। लेकिन वन विभाग के कर्मचारियों से यह अपेक्षा नहीं हैं, जिनका वह आरएफओ भी एक हिस्सा था। मैं किसी यंत्रणा को दोष नहीं दे रहा हूँ, या उनकी गलतियाँ नहीं गिना रहा हूँ, और मुझे मृत आरएफओ के प्रति पूरी सहानुभूती है, लेकिन अगर उसे सही प्रशिक्षण दिया गया होता होता तो यह घटना टाली जा सकती थी, यस मेरे लेख का विषय है।

मैंने पिछले कुछ समय में अलग-अलग राज्यों में कई युवा वनरक्षक और आरएफओ से मिला हूँ। उनमें से ज्यादातर शहरों से/या शहरी जीवन से आते है और वन विभाग में काम करने लगते है क्यों की यह सरकारी नोकरी है, और इसमें कोई गलत बात नहीं है। लेकिन यह जिम्मेदारी किसी महानगरपालिका कार्यालय, या सार्वजनिक बांधकाम विभाग, या बैंक में काम करने जैसी नहीं है। यह जंगल है, और किसी सेना की तरह यहाँ एक गलती भी जानलेवा हो सकती है। और इसीलिए वन्यजीवन के लिए व्यक्ती को बेहद अनुशासित होना और सही प्रशिक्षण लेना जरूरी है। क्या हम इस बारे में सोच रहे है, यह मेरा संबंधित लोगों से सवाल है? पहले ज्यादातर वन रक्षक, उप रेंजर पद पर नियुक्त होने वाले व्यक्ती जो की ग्राउंड स्टाफ होता है और जिनका जंगलों से सीधा संपर्क होता है, उनका चयन स्थानिक लोगों में से ही होता था, क्यों की उन्हे जंगलों की जानकारी होती थी। दूसरी ओर हाल ही में कॉलेज से ग्रेज्युएट होकर निकले युवा है जिन्होने कोई राज्यस्तरीय परीक्षा उत्तीर्ण की हे और आरएफओ बन गए है, आप उन्हे सीधे प्रोजेक्ट टायगर के कोअर या बफऱ क्षेत्र की जिम्मेदारी कैसे दे सकते हो? उन्होंने बाघो की तो बात छोड़िए, कभी अपने जीवन में जंगली सुअर या भालू नहीं देखा होता, इसपर वन्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों नें गौर करना और सही कदम उठाना जरुरी है। अपने कंधे पर सितारे (पद) धारण कर ये युवा जंगल की ऐसे सैर करते है, मान लो जैसे वे किसी मॉल या शहर के किसी रास्ते पर घूम रहे हो, यह मैंने अपनी आँखो से देखा है।

बस कुछ साल पहले की बात है, मैं ताडोबा के नजदिक तेलिया तालाब पर जिप्सी में इंतजार कर रहा था, और एक बड़ा बाघ, "बाघडोह", घास पर आराम कर रहा था, उतने में दो सुरक्षाकर्मी अपने बाइक पर वहाँ पहुँचे, उन्होंने उसे कुछ दूर पार्क किया, और जहाँ बाघ सो रहा था उस तरफ बस दिखावा करने के लिए जाने लगे, जबकि पर्यटक भी चिल्लाकर आगे ना जानें की हिदायत दे रहें थे। नसीब से, उनकी आहट से बाघ उठकर तालाब की विरुद्ध दिशा में जाने लगा, अब आपही सोचिए अगर बाघ समागम कर रहा होता या शेरनी अपने बछडों के साथ होती तो चिजें बिगड़ने में देर नहीं लगती। मैं बस वन कर्मचारीयों के रवय्ये से अवगत करना चाह रहा था जिस वजह से वे जंगल में मुसिबत में पड़ सकते है। इसका पहला कारण है, ये युवा शहर से है, औऱ दूसरा कारण है इनकी नियुक्ती प्रोजेक्ट टायगर जैसे घने जंगलों में करते समय दिए जानेवाले प्रशिक्षण की खामियां! मैं यह, दोहराना चाहता हूँ की इन युवा वन अधिकारियों की बुद्धिमत्ता, चतुराई या समर्पण के बारे में मुझे कोई शंका नही है, लेकिन हम किसी भी काम के लिए अनुभव भी जरुरी होता है इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते, और जब तक उन्हे वह नहीं मिलता तब तक उन्हे ऐसे किसी जगह पर पोस्ट नहीं करना चाहिए ऐसा मेरा मानना है। अगर इस बात पे अमल होता तो रणथंबोर के युवा आरएफओ की जान बच सकती थी।

और फिर जंगलों में केवल बाघ का खतरा नहीं होता, साँप काटना, नदीयों में अचानक आने वाली बाढ़, जंगली-सुअर जैसे जानवर और अवैध शिकारी ऐसी कई संकटों का सामना करना पड़ता है। हर एक वन कर्मचारी को इन मुश्किलों से अवगत करना और उसका सामना करने के लिए प्रशिक्षित करना जरुरी है। वन विभाग के किसी प्रशिक्षण में पेड़ पर चढना जैसे बाते  सिखायी जाती है या नहीं मैं नहीं जानता लेकिन यह सिखाया जाना चाहिये ऐसा मेरा मानना है। मेरा एक सवाल है, कि हम हर वन कर्मचारी को बंदूक क्यों नहीं दे सकते क्यों की अवैध शिकारी इन कर्मचारीयों पर हमला करने से पहले एक बार भी नही सोचेंगे, औऱ यह कर्मचारी ऐसे शिकारियों का सामना लकड़ी के एक डंडे से करे ऐसी अपेक्षा करना गलत होगा। और अगर कोई गौर या जंगली-सुअर हमला करे तो हवा में बंदूक दाग कर उन्हे हड़काया जा सकता है, फिर भी शायद ही कोई आरएफओ पद पर काम करने वाले अधिकारी जंगल में बंदूक लेकर जाते है, यह मेरा निरीक्षण है, जिसका कारण केवल वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ही बता सकते हैं। 

अब इस घटना का दूसरा पहलू समझतें हैं, जो ताडोबा और असम में हुआ, जिनकी उमर उब पचास साल के ऊपर है और जो प्रोजक्ट टायगर के आसपास के गावों के मूल निवासी हैं, वो बाघो को लोगों के आसपास देखते हुए बड़े हुए है, और बाघ के साथ कैसे जीना है वो जानते है। लेकिन जिनकी कई पूश्तें जंगलों, या कोअर क्षेत्र के बाहर रहती आ रहीं हैं, उन्हे घने जंगलों में जाने नहीं दिया जाता जिस तरह से गाँव के बुजुर्ग जाते थे। इसी कारण से युवा पिढी को बाघो के साथ रहने का अनुभव नहीं है। बाघो की संख्या बढ़ने के कारण वे केवल कोअर क्षेत्र में ही नहीं तो बफऱ क्षेत्र और बाहर भी खुले आम घूमते है। लेकिन इन्सान बाघो के इस आज़ादी से वाकिफ नहीं होते, और उन्हे अपनें जीवन में समा नहीं पाते, इसीके परिणामस्वरूप इन्सान या शेरों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। अलग-अलग घटनाओं के विश्लेषण के वाद यह निष्कर्ष निकाला गया है की बाघ के हमलों में जिन इन्सानों के मृत्यू हुए वो ज्यादातर देर रात या सुबह जल्दी हुए है और जो दिन के समय में हुए है उनमें खेतों में अकेले काम करने वालों का समावेश है। जब बाघ आसपास हो तब आपका बरताव कैसा हो इसका प्रशिक्षण स्थानिक लोगों को क्यों नहीं दिया जाता यह मेरा सवाल है, जो मैं वन विभाग के कोशिश के प्रति पूरी तरह से आदरभाव रखते हुए पूछ रहा हूँ। और कोई भी सह-अस्तित्व केवल कुछ नियम बनाकर और उनका पूरी तरह से पालन कर के ही सफल हो सकता है, जिसे मैं अनुशासन कहता हूँ। हम भारतीय अनुशासन का पालन करनें में काफी कच्चे है यही सच्चाई है, चाहे वो कोई भी बात हो शहर के किसी रेड सिग्नल का पालन करना हो या फिर बाघो के क्षेत्र में अकेले चलना हो। वन विभाग और अन्य संबंधितों ने जहाँ पे बाघो का अस्तित्व है वहाँ लोगों नें किस प्रकार अपनी जीवनशैली में बदलाव लाने चाहिए इससे अवगत करना चाहिए। मैं जानता हूँ यह आसान नहीं हैं लेकिन केवल यही तर्कसंगत और सही उपाय है। बाघ भी सह-अस्तित्व के नियमों का पालन करते है और उनके अनुसार जीने की कोशिश करते है, जैसा की मैने ऊपर उल्लेख किया था। लेकिन किसी छोटे बच्चे या बुजुर्ग व्यक्ती के साथ होता है, एक हद से ज्यादा बाघ अपने बरताव में सुधार लाएगा ऐसी अपेक्षा आप नहीं कर सकते। इसीलिए अगर हम यह चाहते है की बाघ जिंदा रहें, तो यह जिम्मेदारी हम इन्सानों की ही है। सह-अस्तित्व का उद्देश सफल होने के लिए हम सही लोगों की मदत ले सकतें हैं (लेनी चाहिए)। और उसके लिए प्रशिक्षण, प्रशिक्षण और केवल प्रशिक्ष यही एक रास्त है। बाघो के वजह से जो इन्सोनों की मौतें हुई है (इन्सानों के वजह से भी बाघ की मौत हुई है) उस पर सोच विचार कर सही परिणाम के लिए एकसाथ काम करना जरूरी है, जिससे इन्सान और बाघ एक साथ शांतीसे रह सके, इसी सपने के साथ आपसे इजाजत लेता हूँ।

* और एक रोचक तथ्य सामने आया की एक महिला किसान पुणे के जुन्नर गाँव मे तेंदूएने के हमले में मारी गई ऐसी खबर थी। लेकिन असल में उसके रिश्तेदारों ने जायदाद के झगड़े को लेकर उसकी हत्या की थी, यह बात पुलिस तहकिकात में सामने आई। रिश्तेदारों को लगा की वे उसकी हत्या को, तेंदूएका का हमला कहकर दबा देंगे क्यु की इस प्रभाग मे तेंदूओके की संख्या बहोत बढ गई है; सच मे, हम इन्सानों के क्या कहने, वाह वाह!
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संजय देशपांडे 

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